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Organic Farming

लौंग की लाभकारी खेती

लौंग एक सदाबहार वृक्ष है और यह समय अति प्राचीन बाद से भारत में एक मसाले के रूप में इस्तेमाल किया गया है। लौंग नम कटिबंधों के एक सदाबहार पेड़ है।लौंग तटीय रेतीले इलाके में छोड़कर देश के सभी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। लेकिन केरल के लाल मिट्टी और पश्चिमी घाट के पर्वतीय इलाकों इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त हैं।

मिट्टी आवश्यकताएँ
रिच, नम कटिबंधों के बलुई मिट्टी लौंग पेड़ों की व्यावसायिक खेती के लिए आदर्श मिट्टी हैं।

दालचीनी खेती एक लाभकारी खेती

दालचीनी का वानस्पतिक नाम है सिनामोन verum और यह एक मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है सूखे भीतरी छाल, जिनमें से एक सदाबहार पेड़ है। दालचीनी के पेड़ पूर्ण विकास पर 6-15 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच है कि मध्यम लंबा पेड़ हैं। दालचीनी अति प्राचीन काल से कारोबार किया गया है कि सबसे पुराना ज्ञात मसालों में से एक है। दालचीनी स्वाभाविक रूप से पश्चिमी घाट के जंगलों में देखा है और व्यावसायिक रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में खेती की जाती है।

टिंडा की उन्नत खेती

भूमि :-

इसको बिभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जलधारण क्षमता वाली जीवांशयुक्त हलकी दोमट भूमि इसकी सफल खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है वैसे उदासीन पी.एच. मान वाली भूमि इसके लिए अच्छी रहती है नदियों के किनारे वाली भूमि भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है कुछ अम्लीय भूमि में इसकी खेती की जा सकती है पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें इसके बाद २-३ बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएँ |

जलवायु :-

मूंग की आर्गेनिक खेती

 

मूँग एक प्रमुख फसल है। इसका वानस्पतिक नाम बिगना सैडिएटा है। यह लेग्यमिनेसी कुल का पौधा हैं तथा इसका जन्म स्थान भारत है। मूँग के दानों में २५% प्रोटिन, ६०% कार्बोहाइड्रेट, १३% वसा तथा अल्प मात्रा में विटामिन सी पाया जाता हैं।

लौकी की जैविक उन्नत खेती

एक बेल पर लगने वाला फल है, जो सब्जी की तरह खाया जाता है। वैकल्पिक नाम 'लउका' या 'कद्दू' है सब्‍जी के रुप में खाए जाने वाली लौकी हमारे शरीर के कई रोगों को दूर करने में सहायक होती है। यह बेल पर पैदा होती है और कुछ ही समय में काफी बड़ी हो जाती है। लौकी एक स्वास्थ्यप्रद सब्जी है जिसकी खेती इस क्षेत्र में परवल की ही तरह प्रमुखता से की जा रही है। गर्मी में तो इसकी खेती विशेष रूप से फायदेमंद है। यही वजह है कि क्षेत्रीय किसान ग्रीष्मकालीन लौकी की खेती बड़े पैमाने पर किए हैं। 

भूमि 

काली मिर्च की खेती

वानस्पतिक विशेषताओं

काली मिर्च के पौधे एक सदाबहार बारहमासी है । यह हवाई जड़ों के माध्यम से पेड़ या trellises को ही देता है और एक परजीवी संयंत्र नहीं है।
पत्ते आयताकार हैं , नोक पर इशारा किया और बारी-बारी से व्यवस्था की।
काली मिर्च के पौधों को एक उथले जड़ प्रणाली है। 2 मीटर की गहराई तक मिट्टी घुसना कर सकते हैं कि कुछ प्रमुख पार्श्व जड़ों वहां आम तौर पर कर रहे हैं।
सफेद फूल मिनट और मुख्य रूप से उभयलिंगी (एक फूल में दोनों लिंगों ) कर रहे हैं ।

जलवायु और मिट्टी की आवश्यकता

हाईब्रिड बैंगन की खेती

बैंगन एक पौष्टिक सब्जी है। इसमें विटामिन ए एवं बी के अलावा कैल्शियम, फ़ॉस्फ़रस तथा लोहे जैसे खनीज भी होते है। यदि इसकी उपयुक्त उत्तम क़िस्में तथा संकर किंस्में बोई जाए और उन्नत वैज्ञानिक सस्य क्रियाएं अपनाई जाएं तो इसकी फ़सल से काफ़ी अधिक उपज मिल सकती है। 

बैंगन की क़िस्में 

पूसा हाईब्रिड -5 

काली मिर्च की खेती

मूल स्थान तथा उत्पादक देश

काली मिर्च के पौधे का मूल स्थान दक्षिण भारत ही माना जाता है। भारत से बाहर इंडोनेशिया, बोर्नियो, इंडोचीन, मलय, लंका और स्याम इत्यादि देशों में भी इसकी खेती की जाती है। विश्वप्रसिद्ध भारतीय गरम मसाले में, ऐतिहासिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से, काली मिर्च का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका वर्णन और उपयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। ग्रीस, रोम, पुर्तगाल इत्यादि संसार के विभिन्न देशों के सहस्रों वर्ष पुराने इतिहास में भी इसका वर्णन मिलता है।

खरबूजा की जैविक खेती

भूमि :-

नदियों के किनारे कछारी भूमि में खरबूजे की खेती की जाती है मैदानी क्षेत्रों में उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट भूमि सर्वोतम मानी गई है पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें इसके बाद २-३ बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएँ |

जलवायु :-

इसके लिए उच्च तापमान और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी सफल खेती के लिए ४४.२२ सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम माना गया है खरबूजे की फसल को पाले से अधिक हानी होती है फल पकने के समय यदि भूमि में अधिक नमी रहेगी तो फलों की मिठास कम हो जाती है |

उन्नत किस्मे :-

पूसा शरबती :-

चीचिंडा की जैविक खेती

प्रजातियाँ :-

अधिकांशत: चिचिंडे की स्थानीय किस्मे उगाई जाती है कई राज्यों के कृषि वि. वि. भारतीय बागवानी अनुसन्धान संस्थान बंगलौर द्वारा उन्नत किस्मे विकसित की गई है जिनके नाम नीचे दिए गए है -

एच. ८ , एच - ३७१, एच.- ३७२ , को. -१ , टी.ए -१९, आइ.आइ.एच.आर.१६ ए |

भूमि :-

चिचिंडे की अधिक पैदावार लेने के लिए जीवांशयुक्त दोमट रेतीली भूमि अच्छी रहती है पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें इसके बाद २-३ बार हैरो या देशी हल चलाएँ और पाटा लगाकर भूमि को समतल या भुरभुरा करें |

जलवायु :-

चिचिंडे के लिए गर्म एवं आद्र जलवायु अच्छी रहती है |

बीज बुवाई :-

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