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धान की जैविक खेती

भूमि का चुनाव

धान कि खेती के लिए अच्छी उर्वरता वाली समतल व अच्छे जलधारण क्षमता वाली मटियार या चिकनी मिटटी सर्वोत्तम होती है सिचाई कि पर्याप्त सुबिधा होने पर हलकी भूमियों में भी धान कि खेती सफलता पूर्वक कि जा सकती है .

खेत की तैयारी

जिस खेत में धान कि रोपाई करनी हो उस खेत में अप्रैल मई में हरी खाद के लिए ढैंचे कि बुवाई 20-25 कि . ग्रा . बीज प्रति हे . कि दर से करे आवश्यकता अनुसार सिचाई करते रहे और जब 5-6 सप्ताह कि हो फसल जाए तो उसे मिटटी में अच्छी तरह मिला दे तथा खेत में पानी भर दे जिससे ढैचा अच्छी तरह से - गल सड़ जाए अगर हरी खाद का प्रयोग नहीं कर रहे तो 20-25 टन गली सड़ी गोबर कि खाद प्रति हे कि दर से खेत में . बिखेर कर अच्छी तरह जुताई करे .

 

जलवायु -

धान के लिए 16-20 35 डिग्री सेल्सियस तापमान फुल आने पर परागण तथा परसेचन हेतु चाहिए तथा पकने पर 18-23 डिग्री सेल्सियस ताप आवश्यक रहता है यदि डिग्री सेल्सियस से ताप अधिक है तो पराग कण झड जाएँगे तथा दाना भराव नहीं होगा कहने का तात्पर्य है अच्छी वानस्पतिक वृद्धि के लिए धान में अपेक्षाकृत कम ताप 20-22 डिग्री सेल्सियस अच्छा माना गया है जिसमे बालियाँ ठीक प्रकार कि निकल आती है अधिक ताप एवं अधिक प्रकाश गहनता दोनों ही दाने के भराव को प्रभावित करते है धान का पौधा एक कम अवधि वाला है रबी में धान कि उपज खरीफ कि तुलना में अधिक होती है जो दक्षिण भारत में ली जाती है धान में 7-8 % प्रोटीन पाई जाती है संसार में धान कि खेती का विस्तार काफी है जैसे आस्ट्रेलिया में 39 डिग्री दक्षिण अक्षांश , जापान में 45 डिग्री उत्तरी अक्षांश , चीन में 50 उत्तरी अक्षांश जबकि भारत में 8-34 2000 डिग्री तक उत्तरी अक्षांश पर खेती है इसकी खेती मीटर उचाई ( जम्मू कश्मीर ) पर ही संभव है बिहार में गहरे मी 5-6 पानी तक धान पैदा किया जाताहै .

पौध

रोपाई के लिए पौध की उम्र -
 

सामान्यत जब पौधे 25-30 दिन पुराने हो जाए तथा उसमे 5-6 पत्तियां निकल जाए तो यह रोपाई के लिए उपयुक्त होती है यदि पौध कि उम्र ज्यादा होगी तो रोपाई के बाद कल्ले कम फूटते है और उपज कि कमी आती है और यदि पौध कि उम्र 35 दिन से अधिक हो गई हो तो उसका उपयोग रोपाई के लिए नहीं करना चाहिए .
 

पौध की रोपाई -
 

रोपाई के लिए पौध उखाड़ने से एक दिन पहले नर्सरी में पानी लगा दे और पौध उखाड़ते समय सावधानी रखे पौधों कि जड़ों को धोते समय नुकसान न होने दे तथा पौधों को काफी निचे से पकडे पौधों कि रोपाई पंक्तियों में करे पंक्ति से पंक्ति कि 20 दुरी सेमी तथा पौधे से पौधे कि दुरी 10 से.मी. रखना चाहिए एक स्थान पर 2-3 पौधे ही लगे इस प्रकार एक वर्ग मी में 50 पौधे होने चाहिए लगभग
 

खाद -
 

बुबाई से पहले धान के बीज को उपचारित करने के लिए गौ मूत्र या नीम का तेल अथवा साडावीर फंगस फाइटर का प्रयोग करें।
रोपाई से पहले35 कुन्तल प्रति एकड़ गोबर मिला देना चाहिए।रोपाई से 10 दिन बाद2 से 3 किलो साडावीर मिट्टी या रेत में मिला कर प्रयोग करें।खाद देने के तीन दिन बाद साडावीर4G व साडावीर फंगस फाइटर का स्प्रे करें। 25 दिन बाद 2 किलो साडावीर और सप्रे साडावीर4G व साडावीर फंगस फाइटर का प्रयोग करें। साडावीर4G व साडावीर फंगस फाइटर का 15 दिन के अन्तराल से प्रयोग करें इससे बीमारियाँ नही आती हैं।
सिंचाई -
 

धान कि फसल के लिए पानी नितांत आवश्यक है परन्तु फसल में अधिक पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है रोपाई के 2-3 सप्ताह तक 5-6 से.मी. पानी बराबर खड़ा रहना चाहिए इसके बाद आवश्यकतानुसार खेत में पानी भरा रहना चाहिए इस बात का विशेष ध्यान रहे कि फुटाव से लेकर दाना भरने तक खेत में नमी कि कमी न होने पे तथा भूमि में दरार न पड़ने पाए अन्यथा पैदावार में भरी कमी हो सकती है .
 

खरपतवार -

 

धान का खरपतवार नष्ट कने के लिए खुरपी का प्रयोग करे

 

कीट नियंत्रण -

मधुआ या ( हापर ) फुदके : -

 

कीड़े बहुत छोटे आकार के और भूरे रंग के होते है जो कि पौधों कि निचली सतह पर कल्लों के बिच पाए जाते है और तने और पत्तियों का रस चूसते है इसके प्रकोप से हरी भरी दिखने वाली फसल अचानक झुलस जाती है झुलसे हुए हिस्से को हापर वर्न कहते है .

 

: रोकथाम -

धान का गाढ़ी कीड़ा -

 

इस कीड़े के प्रौढ़ व निम्फ दोनों दुधिया दानों और पत्तियों का रस चूसते है फलस्वरूप दाना आंशिक रूप से भरता है या खोखला रह जाता है इस कीड़े को छूने से या छेड़ने से बहुत तीखी गंध निकलती है इसी कारण से इसे गंधी बग भी कहते है .

पत्ती लपेट ( लीफ फोल्डर ) कीड़ा : -

इस कीड़े कि सुंडी पौधों कि कोमल पत्तियों के सर कि तरफ से लपेटकर सुरंग सी बना लेती है और उसके - अन्दर अन्दर खाती रहती है फलस्वरूप पौधों कि पत्तियों का रंग उड़ जाता है और पत्तियां सर कि तरफ से सुख जाती है अधिक नुकसान होने पर फसल सफ़ेद और जली सी दिखाई देने लगती है अगस्त से लेकर अक्तूबर तक इसके द्वारा नुकसान होता है . 

तना ( स्टेम बोरर ) छेदक -

यह धारीदार गुलाबी , पीले या सफ़ेद रंग का होता है इस कीड़े कि सुंडी नुकसान पंहुचाती है फसल कि प्रारंभिक अवस्था में इसके प्रकोप से पौधे का मुख्य तना सुख जाता है इसे डैड हर्ट है कहते . 

गुतान ( शिथ ब्लाईट ) झुलसा -

बीमारी भी फफूंद द्वारा फैलती है इसके प्रकोप से पत्ती के शिथ ( गुतान ) पर 2-3 से.मी. लम्बे हरे से भूरे धब्बे पड़ते है जो कि बाद में चलकर भूरे रंग के होते है धब्बों के चारों तरफ नीले रंग कि पतली धारी यह सी बन जाती है . 

पत्ती का झुलसा रोग -

यह बीमारी जीवाणु के द्वारा होती है पौधे कि छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी नहीं हो सकता इस रोग में पत्तियों के किनारे उपरी भाग से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगते है सूखे पीले पत्तों के - साथ साथ राख के रंग के चकते भी दिखाई देते है पूरी फसल झुलसी सो प्रतीत होती है इसलिए इसे झुलसा रोग कहते है . 

ब्लास्ट या झोंका रोग -

यह रोग सफ़ेद फफूंद से फैलता है पौधे के सभी भाग इस बीमारी द्वारा प्रभावित होते है वृद्धि अवस्था में यह रोग पत्तियों पर धब्बे के रूप में दिखाई देता है इनके धब्बों के किनारे कत्थई रंग के तथा बिच वाला भाग रख के रंग का होता है रोग को तेजी से आक्रमण होने वाली का आधार भी ग्रसित भी हो जाता है फलस्वरूप वाली आधार से मुड़कर लटक जाती है : फलत दाने का भराव भी पूरा नहीं हो पाता है . 

खैर रोग -

यह बीमारी धान के जस्ते में कमी के कारण होती है इसके लगने पर निचली पत्तियां पिली पड़नी शुरू हो जाती है और बाद में पत्तियों पर कत्थई रंग के छिटकवा धब्बे उभरने लगते है रोग कि तीब्र अवस्था में रोग ग्रसित पत्तियां सूखने लगती है कल्ले कम निकलते है और पौधों कि वृद्धि रुक जाती है . 

तुंग्रो विषाणु रोग -

यह रोग हरे फुदके किट द्वारा फैलता है यदि रोग का प्रकोप प्रारंभिक अवस्था (60 दिन ) में पूर्ण होता है तो पौधे रोग के कारण बौने रह जाते है कल्ले भी कम बनते है पत्तियों का रंग संतरे के रंग का या भूरा हो जाता है रोग ग्रस्त पौधों में बालियाँ देर से बनती है जिनमे दाने या तो पड़ते ही नहीं यदि पड़ते तो बहुत हलके पड़ते है . 

कटाई -

बालियाँ निकलने के लगभग एक माह बाद सभी किस्मे पक जाती है कटाई के लिए 80% 80% बालियों में दाने पक जाए और उनमे नमी 20% जब हो वह समय कटाई के लिए उपयुक्त होता है कटाई दरांती से जमीन कि सतह पर व ऊपर कि भूमियों में निचे कि सतह से 15-20 से.मी. ऊपर से करनी चाहिए मड़ाई साधारणत हाथ से पीटकर कि जाती है शक्ति चालित थ्रेशर का उपयोग भी बड़े किसान मड़ाई के लिए करते है कम्बाइन के द्वारा मड़ाई और कटाई का कार्य एक साथ हो जाता है मड़ाई के बाद दानो कि सफाई कर लेते है सफाई के बाद धान के दानों को अच्छी तरह सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिए भण्डारण से पूर्व दानों को 12% नमी तक सुखा लेते है . 

उपज -

समस्त  उपर्युक्त   क्रियाओं  - व प्रजातियाँ अपनाने पर शीघ्र पकने वाली प्रजातियों कि प्रति हे . औसत उपज 40-5 क्विंटल मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों 50-60 प्रति हे से उपज . है और संकर धान से 60-70 हे किन्टल /. उपज है . 

भण्डारण -

मड़ाई के बाद दानों कि सफाई कर लेते है सफाई के बाद धान के दानों को अच्छी तरह सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिए भण्डारण से पूर्व दानों को 12% नमी तक सुखा लेते है . 

नर्सरी बोने की विधि -

धान कि भीगी विधि से पौध तैयार करने का तरीका उत्तरी भारतमे अधिक प्रचलित है इसके लिए खेत में पानी 2-3 बार जुताई करते है ताकि मिटटी लेहयुक्त हो जाए तथा खरपतवार नष्ट हो जाए आखिरी जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर ले जब भरकर मिटटी कि सतह पर पानी न रहे तो खेत को 1.25 -1.50 चौड़ा तथा सुबिधा जनक क्यारियों में बाँट लेन ताकि बुवाई , निराई और सिचाई कि बिभिन्न सस्य क्रियाएँ आसानी से कि जा सके क्यारियां बनाने के बाद पौधशाला में 5 से . मी ऊंचाई . तक पानी भर दे और अंकुरित बीजों को समान रूप से क्यारिओं में बिखेर दे अगले दिन सुबह खड़ा पानी निकाल दे और एक दिन बाद ताजे पानी से सिचाई करे यह प्रक्रिया 6-7 दिन तक दोहराए इसके बाद खेत में लगातार पानी रखें परन्तु इस बात का ध्यान रखे कि किसी भी अवस्था में पौध पानी में न डूबे . 

organic farming: 
जैविक खेती: