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प्रकृति की अव्यवस्था पर एक नज़र

पृथ्वी पर कोई भी जीव एकल जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है इसलिए मानव और प्रकृति की परस्पर आत्मनिर्भरता एवं सद्भावनाओं को समाप्त करने से हमारा पारिस्थितिकी तंत्र डगमगा रहा है। पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, वैभव और ऐश्वर्य प्राप्त करने के उतावलेपन और पर्यावरण पर विजय पाने की लालसा ने प्रतिकूल प्रभाव डाला है। इससे हमारा स्थायी विकास होना तो दूर हम अपना मानसिक संतुलन ही खोते जा रहे हैं। प्रकृति द्वारा करोड़ों वर्ष की यात्रा के उपरान्त बना हमारा प्राकृतिक पर्यावरण मानव की दुश्वृत्तियों के कारण नष्ट होता जा रहा है।

मानव निर्मित प्राकृतिक व्यवस्था- पारिस्थितिकी तंत्र एवं मानव समाज जो एक दूसरे पर आश्रित रहा है उसे बनाये रखना होगा और प्रकृति का अत्यधिक दोहन न करने की चेतना का विकास करने हेतु विश्वव्यापी अभियान छेड़ना होगा जिससे प्रकृति एवं जीवधारी अपना कार्य संतुलित ढ़ंग से कर सके। तीव्र गति से जल, नभ, थल, वायु ध्वनि आदि के प्रदूषण बढ़ते हुए ऐसी स्थिति को प्राप्त न हो जाए कि मानव को अपने अस्तित्व के लिए खुद ही मृतप्राय हो जाने की स्थिति से बचाना होगा।

पैदावार पर दुश्प्रभाव- भारत कृषि प्रधान देश है। यहां पर चावल के पैदावार में 1980 के बाद से गिरावट देखी जा रही है और आशंका जताई जा रही है कि चावल की खेती में भारी कमी हो सकती है। प्रतिवर्ष कृषि भूमि की क्षति हो रही है, पर्यावरण के प्रभावों से वर्षा प्रभावित हो रही है और ग्रीष्म निरंतर तापमान में वृद्धि करती जा रही है जिसके परिणाम स्वरूप वर्षा ऋतु में भी बारिश नही हो रही है। नतीजा यह है कि कृषि की सिंचाई प्रभावित हो रही है। शुष्क क्षेत्र और शुष्क होते जा रहे है तथा सर्दियों में फसलें बर्फबारी से भी नष्ट हो रही है।

वाह्य एवं आंतरिक प्रदुषण- बायोमास ईधन, ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी का ईधन, फसलों के अवशेष आदि का ईधन के रूप में उपयोग तथा जीवाश्म ईधन, पावर प्लांट, प्रदुषित जल, कोयला और डीजल आदि से लगातार वायु प्रदुषण बढ़ रहा है। अपशिष्ट डंपिन्ग के प्रभाव से जलाशय तथा झीलें अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। प्रदुषण के परिणाम स्वरूप ग्रीन गैस का उत्पादन हानिकारक स्थिति में पहुचकर धरती को नुकसान पहुचा रहा है।

भूमि प्रदूषण- भारत में भूमि प्रदूषण का मुख्य कारक कीटनाशकों और उर्रवरा के क्षरण के परिणाम स्वरूप देखने को पंजाब के फरीदकोट और भटिन्डा में प्रकाश में आया है। यहां पर यूरेनियम की मात्रा विषाक्तता के स्तर पर पहुच गयी हैं। इसका परिणाम वहां पर बालकों में जन्मजात विकृति के रूप में सामने आया है। यहां पर होने वाली विषाक्तता का मुख्य कारण तापीय विद्युत परियोजनाओं के द्वारा उत्पादित राखों से बन गये जलाशय को ही माना जा रहा है।

प्लास्टिक से प्रदूषण- भारत में भी विश्व के अन्य देशों की भांति प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण की मात्रा दिनो दिन बढ़ती ही जा रही है। इसमें छोटे से छोटे खाद्य पदार्थों व वर्जित पान मसाले के गुटको, के पाउच तथा अन्य उत्पाद की प्लास्टिक पैकिंग से शहरों के क्षेत्र तो पटे ही जा रहे हैं साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। जो भारत के लिए तो हानिकारक है ही साथ हमारी पृथ्वी की भी जान को जोखिम में डाल रही है।

मोबाइल से प्रदूषण- आज स्वच्छन्द आकाश में विचरण करने वाले पक्षियों की जान को ख़तरा मोबाइल टावर से उठने वाली रेडिएशन से हो गया है। इन रेडिएशन के कारण ही शहरी क्षेत्र में मानव को कैन्सर अपनी गिरफ्त मे पूरी तरह से फंस चुका है। इसके अतरिक्त मोबाइल खराब होने की वज़ह से समाज में वेस्ट मैटेरियल का कचरा भी समाज को तोहफे में मिल रहा है जो कि नष्ट होने के मामले में दुर्लभ ही है।

ऋतुओं पर असर- भारत देश हेमन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, चार प्रकार के मौसम के लिए दुनियाभर में जाना जाता रहा है परन्तु वातारण के अद्भुत परिवर्तन ने इन्हें तीन ऋतुओं पर ही समेट दिया है। मार्च माह से ही ग्रीष्म प्रारम्भ हो जाती है और नवम्बर तक बनी रहती है और लगभग आघे दिसम्बर से शरद आती है और जनवरी तक एक माह तक रहता है। आधे जनवरी से फरवरी माह तक हेमन्त रहता है और पुनः ग्रीष्म अपना पदापर्ण कर जाता है। कृषि प्रधान देश भारत आज इसकी मार झेल रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप फसल की पैदावार कम हो गयी है जिसके कारण विदर्भ एवं बुन्देलखण्ड के कुछ क्षेत्र के लोग भुखमरी से प्रभावित हो रहे है।

प्रदूषण से जलस्तर में कमी- भारत के विभिन्न क्षेत्रों में निरन्तर जलस्तर में गिरावट होती जा रही है जिससे मनुष्य को पीने के लिए पानी की कमी हो रही है। बढ़ता हुआ ताप और साथ में वृक्षों की अवैध तथा वैध कटान दोनों ही मिलकर वातावरण में विनाशक की भूमिका अदा कर रही है।

आज आवश्यकता है कि सभी देश सम्मिलित रूप से प्रयास करें कि वातावरण के प्रति उनका दायित्व है और हर देश का निवासी स्वयं के स्तर पर विलुप्त प्राय जलाशयों को वृक्षों से आच्छादित कर दें कूपों का पुर्न जीर्णोद्धार करें। कृषि कार्य में व्यस्त किसान जैविक खेती को बढ़ावा दें। जिससे कि धरा पर उर्वरा शक्ति का पुनः सुजन हो सके। शहर वासियों को पैक्ड फूड के चलन से बचाना होगा जिससे कि कभी नष्ट न होने वाले पर्यावरण दूषित करने वाले तत्वों में घरा पर से कम किया जा सके। यह भी सच है कि विभिन्न देशों नंे इस दिशा में कदम बढाया तो है मगर इस प्रयास को सघन करना होगा । स्वच्छता के अभियान को और शक्ति प्रदान करने की आज विशेष जरूरत है।

 

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