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Aksh's blog

आज़ाद देश में बेबस अन्नदाता

आज़ाद देश में बेबस अन्नदाता

भारत एक कृषि प्रधान देश है , किसान अन्नदाता है,देश की अर्थव्यवस्था में 70%कृषि का योगदान है सदियों से हम लोग कुछ जुमलो को दोहराते रहे है । निःसंदेह भारत की पिछले हजार दो हजार साल की अर्थ व्यवस्था कृषि पर आधारित रही है हांलाकि यह इस अर्थ में सही है कि अधिकांश लोग कृषि कार्य करते थे, और कृषि कार्य के आधार पर ही अपनी जीविका चलाते थे।

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

निःसन्देह वर्ष 2017 कृषि संकट का वर्ष रहा। देश के कई राज्यों में मौसम की मार से जूझते किसानों ने लाभकारी मूल्य पाने के लिये आन्दोलन किए, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों ने किसानों के हजारों करोड़ रुपए के ऋण माफ किए। बीते वर्ष किसानों को मिली निराशाओं और चिन्ताओं को ध्यान में रखते हुए नए वर्ष 2018 में केन्द्र सरकार कृषि व किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती दिखेगी।

बजट 2018 में किसान

बजट 2018 और किसान

नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के 2018-19 को किसानों और ग्रामीणों का बजट बताया जा रहा है। पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली फिर प्रधानमंत्री ने बार-बार जोर देखकर कहा कि ये बजट किसानों और गांव का बजट है। हम किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी करेंगे और हर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य देंगे।

देश की कृषि व्यवस्था फसी बड़े संकट में

देश की कृषि व्यवस्था फसी बड़े संकट में

भारत में विकास का जो प्रारूप विकसित हुआ, उसमें मनुष्य के साथ प्रत्येक जीव व् जड़ प्रकृति की आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया था। मनुष्य के केवल भौतिक पक्ष  की ही चिंता करने की बजाए उसके सामाजिक, मानसिक और आत्मिक पक्षो की भी चिंता की गई थी। केवल  मनुष्य को सुख-सुविधाओं से लैस करने की कभी कोई योजना अपने यहां नहीं बनाई गई, इसलिए देश में एक मुहावरा प्रचलित हुआ "उत्तम खेती, मध्यम बान; निकृष्ट  चाकरी, भीख निदान" इसका अर्थ बहुत साफ़ है। नौकरी करने को अपने देश में एक मुहावरा के तौर पर लिया गया अर्थात् नौकरी को कभी महत्ता नहीं दी गई। पशु,भूमि और मनुष्य इस प्रकार पूरी प्रकृति मात्र का पोषण करने वाली खेती को

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