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मुर्गीपालन में संतुलित आहार की भूमिका

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मुर्गीपालन में संतुलित आहार

जैसा कि सर्वविदित है कि वर्तमान युग में मुर्गीपालन का मुख्य उद्देश्य प्रोटीनयुक्त आहार प्राप्त करना है। मुर्गी का अण्डा एवं मांस सस्ता प्रोटीन आहार तो है ही, इनके उत्पादन में कम पूंजी व कम समय को आवश्यकता होती है। मानव के लिए बेकार अनाज, हरा चारा, विटामिन्स एवं पोषक तत्वों मुर्गी को खिलाकर एक उत्तम, सुपाच्य पौष्टिक पदार्थ मानव के लिए मुर्गी के अण्डे के रूप में उपलब्ध हो जाता है इसलिए अनेक वैज्ञानिक मुर्गी को अद्भूत प्रवर्तक यंत्र की संज्ञा देते हैं। मानव हेतु तैयार किए पक्षियों को पौष्टिक एवं संतुलित आहार ही मिलना चाहिए। मुर्गी पालन व्यवसाय में 60 प्रतिशत व्यय तो केवल मुर्गी आहार पर होता है

कड़ाके की ठंड और कोहरा मतलब गेहू के अच्छे दिन

कड़ाके की ठंड में इंसानों के साथ जानवरों को दिक्कत जरूर हो रही है लेकिन फसलों में खासकर गेहूं के लिए मौसम का मौजूदा मिजाज फायदे का सौदा बन गया है। पिछेती गेहूं की फसल में कल्ले फूटने के लिए जिस तरह का तापमान चाहिए, वह उसे पिछले चार-पांच दिन में मिल गया। गेहूं के अच्छे दिन के आगाज से वैज्ञानिकों को भी बंपर पैदावार का अनुमान है। करीब तीन महीने में पक कर तैयार होने वाली गेहूं की फसल की दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक बुआई हुई थी।

देश की कृषि व्यवस्था फसी बड़े संकट में

देश की कृषि व्यवस्था फसी बड़े संकट में

भारत में विकास का जो प्रारूप विकसित हुआ, उसमें मनुष्य के साथ प्रत्येक जीव व् जड़ प्रकृति की आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया था। मनुष्य के केवल भौतिक पक्ष  की ही चिंता करने की बजाए उसके सामाजिक, मानसिक और आत्मिक पक्षो की भी चिंता की गई थी। केवल  मनुष्य को सुख-सुविधाओं से लैस करने की कभी कोई योजना अपने यहां नहीं बनाई गई, इसलिए देश में एक मुहावरा प्रचलित हुआ "उत्तम खेती, मध्यम बान; निकृष्ट  चाकरी, भीख निदान" इसका अर्थ बहुत साफ़ है। नौकरी करने को अपने देश में एक मुहावरा के तौर पर लिया गया अर्थात् नौकरी को कभी महत्ता नहीं दी गई। पशु,भूमि और मनुष्य इस प्रकार पूरी प्रकृति मात्र का पोषण करने वाली खेती को

आखिर किसान ही सभी वर्ग के निशाने पर क्यों हैं ?

आखिर किसान ही सभी वर्ग के निशाने पर क्यों हैं ?

सरकार ने हाल ही में उच्चतम न्यायालय में स्वीकार किया कि मुख्य रूप से नुकसान और कर्ज की वजह से पिछले चार वर्षों में लगभग 48,000 किसान अपनी ज़िन्दगी खत्म कर चुके हैं। सरकार के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों से पता चलता है कि यही प्रवृत्ति 1997-2012 के दौरान रही, इस दौरान करीब 2,50,000 किसानों ने अपना जीवन गँवाया, इस अवधि के बाद सरकार विवरण देना बंद कर दिया। खर्चों को पूरा करने के लिए किसानों को बैंकों से या स्थानीय ऋणदाताओं से अपनी फसलों को बोने के लिए उधार लेना पड़ता है। ज़्यादातर मामलों में स्थानीय ऋणदाता होते हैं जो कर्ज देते हैं। एनएसएसओ आँकड़ों के मुताबिक 52% से अधिक

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