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खेती में देशी गाय की उपयोगिता

खेती में देशी गाय की उपयोगिता

 कृषि पर जलवायु परिवर्तन के संभावित दुष्प्रभावों पर विश्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट में चेतावनी देते हुए बताया है कि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्वि का खामियाजा दक्षिण एशियाई देशों में भारत को सर्वाधिक भुगतना पड़ सकता है यहाँ की कृषि पर इसका बुरा असर पड़ेगा। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से आंधा्रप्रदेश के किसानों की आय बीस फीसदी तक घट जाएगी, महाराष्ट्र में गन्ना उत्पादन में पच्चीस से तीस फीसदी की गिरावट संभव है तथा उड़ीसा में चावल उत्पादन में बारह फीसदी की गिरावट आएगी।फसल उत्पादन में गिरावट का सीधा असर निश्चित रूप से हमारी अर्थ व्यवस्था पर होगा जिससे देश में गरीबी बढ़ेगी।जलवायु परिवर्तन के साथ साथ देश में बड़ी मात्रा में खेती योग्य भूमि के बंजर हाती जा रही है।जिसके उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।खेती में बढ़ती लागत से किसान कर्जदार होकर आत्महत्या करने मजबूर हो रहा है। जबकि हमारे देश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है तथा देश की सत्तर फीसदी आबादी इस पर आधारित है,ऐसी स्थिति में कृषि के रूख में यह परिवर्तन देश को संकट में ला देगा। लेकिन न तो जलवायु परिवर्तन का यह दौर आसानी से समाप्त होने वाला है और न ही वर्तमान की आधुनिक कृषि पद्वति से बढ़ता भूमि का बंजरीकरण रूकनेवाला है।ऐसे में हमारी खेती संकट में है। अगर हमें देश की खेती पर आसन्न संकट से निपटना है तो कृषि में उन पद्वतियों को अपनाना होगा जो इसे रोकने में सक्षम हो।

                  इसके लिए हमें गौ आधारित खेती का मार्ग अपनाना होगा। वैसे हमारे देश में पिछले दस हजार वर्षो से गौ आधारित खेती की व्यवस्था रही है।जिसमें गोवत्स बैल बनकर भूमि सुधार और बुआई का कार्य सम्पन्न कराते थे तथा गौमय अर्थात गोबर का खाद भूमि को जीवांत रख उसे उर्वर बनाए रखता था। गौमूत्र और मठा जैसे तत्व फसलों की हानिकारक कीटों से सुरक्षा करने में सहायक होते थे।चूॅकि फसलों की वृद्वि और उत्पादन के लिए जिन तत्वो की आवश्यकता होती है वो भूमि में र्प्याप्त मात्रा में होते हैं। लेकिन उन्हें पोधों की जड़ों में पहॅुचाने का कार्य सूक्ष्म जीवाणु करते हैं। रासायनिक खेती में प्रयुक्त तेज रसायन इन सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर देतें हैं जिससे भूमि की उर्वरकता कम हो रही है। लेकिन देशी नस्ल की गाय का गोबर इन जीवाणुओं को संबधित करता है। देशी गाय के एक ग्राम गोबर में कम से कम 300 से 500 करोड़ तक सूक्ष्म जीवाणु होते हैं जो भूमि के पोषक तत्वों को पौधो के लिए आहार में बदल देते है।केंचुएॅ प्राकृतिक हल का काम करते है। लेकिन रायायनिक खेती ने इन्हें नष्ट कर दिया जिससे भूमि कठोर हो जाती है लेकिन गोबर की खाद इन केचुओं को पनपने का उर्पयुक्त माहौल तैयार करता है।गोबर युक्त खाद खेत का तापमान 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तक बनाए रखता है तथा नमी की मात्रा 65 से 72 फीसदी कर देता है जो कि सूक्ष्म जीवों के निर्माण के लिए उपयुक्त होता है।कृषि कार्य में बीजोपचार महत्तवपूर्ण होता है यदि हम बोवनी के पूर्व बीज उपचार नहीं करते हैं तो बीजों को नुकसान पहॅुचाने वाले फफूॅद सक्रिय रहते हैं और भुमि में इनकी मात्रा बढ़ती रहती है जो कि जड़ों के माधयम से पौधों में प्रवेश कर उसे नष्ट कर देती है।कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार  बीजोपचार के लिए देशी नस्ल की गाय के गोमूत्र से अच्छा कोई रसायन नहीं है। इसमें नीम और मठा आदि का मिश्रणकर बीज उपचार के लिए बगैर कीमत दिए एक अच्छा और सशक्त रसायन तैयार किया जा सकता है। फसल वृद्वि के लिए उर्वरक जरूरी होते हैं और ये रासायनिक खादों के जरिए दिए जाते हैं लेकिन ये रासायनिक खाद वायुमण्डल में कार्बन डाय आक्साइड और नाइट्रस आक्साइड का अवक्षेपण बढ़ाती है जो कि ग्लोबल बार्मिंग की समस्या को बढ़ा रही है। ब्रिटेन में की गई रर्िसच के अनुसार वहॉ प्रति हे. खेती पर अकेले उर्वरको के जरिए 170 लीटर आइल खर्च होता है। वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष 90 मिलियन टन खनिज तेल का उपयोग नाइट्रोजन उर्वरक तैयार करने में किया जाता है जिससे 250 मिलियन टन कार्बनडाइ आक्साइड वायुमंडल में घुलती है। रासानिक खाद खेती को मॅहगी करता हैं। इसका विकल्प है गो आधाारित खेती हैं- देशी गाय के गोबर से अमृतपानी नामक तरल खाद आसानी से तैयार की जा सकती है जिसमें एक एकड़ खेती के लिए लागत आती है महज तीस से पैंतीस रूपया।यह अमृतपानी आलू प्याज जैसी केद वाली फसलों के बंफर उत्पादन में उपयोगी है। सींग खाद फसलों के लिए वरदान है जो कि एक ग्राम मात्रा मे एक एकड़ की फसल को वृद्वि देता है जिसे किसान देशी गाय सा बैल के सींग के जरिए स्वयं ही बगैर पैसे खर्च कर तैयार कर सकता है।वर्मी कम्पोस्ट,नाडेप खाद,मटका खाद जैसे उत्पाद भी किसान मुफत में ही तैयार कर सकता है।फसलों को जहरीला बनाने और उत्पादन लागत बढ़ाने में रासायनिक कीटनाशकों का बड़ा योगदान है लेकिन देशी गाय का गोमूत्र एक अच्छा फसल रक्षक है इसमे नीम, कनेर,लहसुन और मिर्च आदि को मिलाकर इसे अधिक तीक्ष्ण किया जा सकता है।वास्तव में गौआधारित खेती जीरो बजट की खेती हैं। पर्यावरण हितैषी और ग्लोबल वार्मिंग  को रोकने वाली है। गौ आधारित खेती भुमि की उत्पादकता को बढ़ाने में सहयोगी है।

डॉ. सुनील शर्मा