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लौकी ,तोरई टिंडा आदि फसलों में आने वाले रोग व उनके उपचार

गर्मियों में बेल वाली सब्जियाँ जैसे लौकी, तरोई, टिंडा आदि की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है और इनकी खेती करके प्रति इकाई क्षेत्रफल में अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। यदि इन सब्जियों की खेती में कुछ सामान्य रोग और व्याधियों का ध्यान दिया जाए तो प्रति इकाई क्षेत्रफल से कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इस मौसम में चूंकि गेहूं की फसल पक रही होती है या कट चुकी होती है। ऐसे में रस चूसने वाले कीट व पत्ती खाने वाले कीट अपना आश्रय ढूंढते हैं और ज्यादातर कीट सब्जी के फसलों में लग जाते हैं। इस प्रकार से बेल वाली सब्जियों में भी कई प्रकार के कीट आक्रमण करते हैं, जिनमें प्रमुख रूप से: 

 रस चूसने वाले कीट 

1. रस चूसने वाले कीटों  जैसे  थ्रिप्स व सफेद मक्खी हैं जिनकी रोकथाम के लिए  खेत में  यलो ट्रेप का प्रयोग करना चाहिए। 10 यलो ट्रेप प्रति एकड़ की दर से  प्रयोग करने से प्रभावी रूप से  इन कीटों  का प्रबंधन हो जाता है।  रसायनों में  हल्के रसायन  जैसे  डाई-मेथोएटड/एसीफेट आदि का  1.5 एम एल/ 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से  घोल बनाकर  छिड़काव करने से इनका नियंत्रण हो जाता है। यही छिड़काव  खेत की मेड़ों  के ऊपर व आसपास के खरपतवारों  के ऊपर भी करें, जिससे यह रस चूसने वाले कीट  आसपास के क्षेत्र से भी नष्ट हो जाएं।

पत्ती खाने वाले कीट

2. पत्ती खाने वाला लाल मतकुल कीट (Red Pumpkin Beetle) भी इन फसालों को बहुत नुकसान पहुंचाता है । ये कीट पत्तियों में गोल - गोल छेद कर देता है व अधिक आक्रमण होने पर पत्तियां जाली जैसी हो जाती हैं और इससे उत्पादन प्रभावित होता है। इसके प्रबंधन हेतु थावलों की गुड़ाई करें। बड़े खेत में गुड़ाई संभव नहीं होती है, इसलिए तार की एक छोटी पंजी बना ले और उससे बेलों की जड़ो के पास रेकिंग करें। रेकिंग भी एक प्रकार की गुड़ाई ही होती है, इससे कम समय में ज्यादा क्षेत्रफल में गुड़ाई की जा सकती है। इसके अतिरिक्त खड़ी फसल में प्रकोप होने पर क्लोरोपयारिफास (chloropyriphos) धूल का 3-4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से व फसल की स्थिति के अनुसार सुबह-सुबह भुरकाव करें।
3. फल मक्खी की रोकथाम के लिए लौकी, तोरई के फल- मक्खी- प्रपंच बाजार में उपलब्ध है। 8 प्रपंच प्रति एकड़ की दर से खेत में प्रयोग करें और 20 से 25 दिन बाद पुनः इस प्रक्रिया को दोहराएं । ऐसा करने से फल मक्खी का प्रकोप काफी कम हो गया है। किसी भी प्रकार से फल मक्खी ग्रस्त या बीमारी ग्रस्त फलों को खेत में ना छोड़ें । उनको तोड़ कर गहरे गड्ढे में डालकर नष्ट कर दें । 

 तना छेदक 

4. कभी-कभी बेलों में तना छेदक का भी प्रकोप हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए थायोमेथोक्साम (Thiomethoxam) नामक दवा का आधा ग्राम/ लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें।
5. लौकी,  तरोई, टिंडा आदि बेल वाली सब्जियों में बेल मुरझान नामक रोग प्रायःरोग देखा गया है। इस रोग की मुख्य पहचान अचानक बेले मुरझाने लगती हैं। तने में हल्की लकीरें पड़ने लगती हैं। तने फटने लगते हैं और उनसे गोंद बहने लगता है। यह एक मृदा जनित रोग है। इस रोग से बचाव हेतु 3 से 4 साल का फसल चक्र अपनाएं तथा शुद्ध व प्रमाणित बीज ही बोये। बीजों का व थान्वाले का शोधन कार्बेंडाजिम नामक रसायन से करें । खड़ी फसल में कॉपर ऑक्सिक्लोराइड नामक फफूंदीनाशी का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। ध्यान रखें जब मौसम में गर्मी 28 डिग्री से ज्यादा हो तब इस फफूंदीनाशी का छिड़काव ना करें । प्रभावित पौधो को समूल उखेड़कर नष्ट कर दें ।
6. डाउनी मिलड्ययू  रोग : यह रोग भी इन फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाता है । इस रोग की मुख्य पहचान पत्तियों पर काले भूरे धब्बे बनते है, जो धीरे-धीरे बढ़ कर तने तक व पूरी बेल में फैल जाते हैं और बेले सूख जाती हैं । इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक है की खेतों में कभी भी पानी सुबह व दोपहर को ना दें, बल्कि सायं के समय पानी दें। इससे उमस कम पैदा होगी और यह रोग कम आएगा। प्रभावित बेलो के सूखे पत्तों को एकत्र करके खेत से बाहर जला दें। खड़ी फसल में डायथेन एम 45 (Daithen M45) नामक फंफूंदीनाशी का 2.5 ग्राम/ लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें।
7. बेलों का सूखना: बेलों का सूखना कई कारण से होता है। जड़ सड़न, जड़ का उखटा आदि रोगों द्वारा बेले सूखती है। इन रोगों में पहले पत्ते हल्के पीले पड़ते हैं फिर धीरे-धीरे मुरझान शुरू होती है। रोग की व्यापकता आने पर पूरी बेले सूख जाती हैं । इस रोग के निदान के लिए बीज का शोधन करने के उपरांत ही बुबाई करें । रोपाई के बाद कार्बेंडाजिम की 1% दवा के घोल का ड्रेंचिंग करना चाहिए।  रोग आने पर भी कार्बेंडाजिम की 1% दर से ड्रेंचिंग करनी चाहिए।
8. पाउडरी मिलड्ययू : इस रोग को खर्रा या दहिया आदि नामों से भी जाना जाता है। इसमे बेलो पर व पत्तों पर सफेद पाउडर जैसा फफूंद दिखाई देता है। पत्तों में भोजन बनाने की क्रिया प्रभावित होती है, जिससे बेले कमजोर हो जाती हैं और फल गिरने लगते हैं तथा उत्पादन भी प्रभावित होता है । इसकी रोकथाम के लिए ट्राईडीमॉर्फ (Tridimorf) नामक दवा की 1 मिलीलीटर दवा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें ।
किसान भाइयों इस वर्ग के फसलो की ये प्रमुख रोग और व्याधियां हैं जिनका अगर आप ध्यान रखेंगें तो आप बेहतर उपज ले सकेंगें ।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें, 
डॉ आर के सिंह,

अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र बरेली

[email protected]

 

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