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शंखपुष्पी की खेती

पुष्पभेद से शंखपुष्पी की तीन जातियाँ बताई गई हैं। श्वेत, रक्त, नील पुष्पी। इनमें से श्वेत पुष्पों वाली शंखपुष्पी ही औषधि मानी गई है।मासिक धर्म मे सहायक है। शंखपुष्पी के क्षुप प्रसरणशील, छोटे-छोटे घास के समान होते हैं। इसका मूलस्तम्भ बहुवर्षायु होता है, जिससे 10 से 30 सेण्टीमीटर लम्बी, रोमयुक्त, कुछ-कुछ उठी शाखाएँ चारों ओर फैली रहती हैं। जड़ उंगली जैसी मोटी 1-1 इंच लंबी होती है। सिरे पर चौड़ी व नीचे सकरी होती है। अंदर की छाल और लकड़ी के बीच से दूध जैसा रस निकलता है, जिसकी गंध ताजे तेल जैसी दाहक व चरपरी होती है। तना और शाखाएँ सुतली के समान पतली सफेद रोमों से भरी होती हैं। पत्तियाँ 1 से 4 सेण्टीमीटर लंबी, रेखाकार, डण्ठल रहित, तीन-तीन शिराओं से युक्त होती हैं। पत्तियों के मलवे पर मूली के पत्तों सी गंध आती है।

शंखपुष्पी का पौधा बहुवर्षीय होता है. इसकी की खेती भारत में किसी भी तरह के मौसम में की जा सकती हैं. लेकिन इसके पौधे पैदावार दिसम्बर माह के बाद ही देते हैं. इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु को उपयुक्त माना जाता है. इसकी खेती समुद्र तल से 1200 से 1300 मीटर उंचाई वाली भूमि में आसानी से की जा सकता है. इसकी खेती के लिए बारिश की अधिक आवश्यकता नही होती. शंखपुष्पी का सम्पूर्ण पौधा उपयोगी होता है. और इसका बाज़ार भाव काफी अच्छा मिलता हैं. जिस कारण किसान भाई इसकी खेती की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं.

अगर आप भी इसकी खेती के माध्यम से अच्छा लाभ कमाना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

जलवायु और तापमान

शंखपुष्पी की खेती के लिए जलवायु और तापमान दोनों मुख्य कारक के रूप में काम करते हैं. शंखपुष्पी की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु को काफी अच्छा माना जाता है. इसकी खेती के लिए बारिश के बाद का मौसम सबसे उपयुक्त होता है. इसकी खेती के लिए अधिक गर्मी और बरसात दोनों ही उपयोगी नही माने जाते. अधिक तेज़ गर्मी और सर्दी में इसके पौधे विकास नही करते. इसकी खेती के लिए अधिक बारिश की भी जरूरत नही होती.

शंखपुष्पी की खेती के लिए शुरुआत में बीजों के अंकुरण के वक्त 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती हैं. बीज और पौधों के अंकुरण के बाद इसके पौधों को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान की जरूरत होती हैं. इसका पौधा अधिकतम 35 और न्यूनतम 10 डिग्री तापमान को सहन कर सकता हैं. इसे कम या ज्यादा तापमान होने पर इसके पौधे विकास करना बंद कर देते हैं.

उन्नत किस्में

शंखपुष्पी की कई उन्नत किस्में पाई जाती हैं जिन्हें उनकी पैदावार और फूलों के रंगों के आधार पर तैयार किया गया है. फूलों के रंग के आधार पर शंखपुष्पी की तीन प्रजातियां ही पाई जाती है. जिन्हें सफ़ेद, नीली और लाल फूलों वाली किस्मों में शामिल किया गया हैं.

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शंखपुष्पी की इस किस्म का पौधा झाड़ीनुमा दिखाई देता हैं. इसके पौधे पर नीले रंग के फूल दिखाई देते हैं. इसके हरे पेड़ो का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 160 से 200 क्विंटल तक पाया जाता हैं. इसका पौधा सामान्य ऊंचाई का होता है, जिस पर छोटे आकार की पत्तियां पाई जाती हैं. इसकी शाखाओं पर हल्की मात्रा में रोएं पाए जाते हैं.

उन्नत किस्म का पौधा

शंखपुष्पी की इस किस्म के पौधों का तना एक फिट के आसपास लम्बाई का पाया जाता हैं. इस किस्म के पौधे की शखाएं चारों तरफ फैली होती हैं. इसके पौधे की छाल में से दूध जैसा पदार्थ निकलता हैं. इस किस्म के पौधों पर सफ़ेद और नीले रंग के फूल दिखाई देते हैं. और इसके बीजों का रंग काल पाया जाता हैं. इस किस्म के हरे पेड़ो का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 180 क्विंटल के आसपास पाया जाता हैं.

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शंखपुष्पी की इस किस्म के पौधों पर नीले रंग के फूल पाए जाते हैं. और इसके पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिनकी शखाएं फैली हुई होती हैं. जो सुतली के सामान मोटाई की पाई जाती हैं. इसकी शखाओं पर रोएं काफी ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 200 क्विंटल तक पाया जाता हैं.

इनके अलावा और भी कुछ किस्में हैं. जिन्हें अलग अलग जगहों पर उगाया जाता हैं. जिनमें सी-15, डी-121, उदय और क्रांति जैसी किस्में मौजूद हैं.

खेत की तैयारी

शंखपुष्पी की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से युक्त भुरभुरी मिट्टी का होना जरूरी होता हैं. इसके लिए शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. खेत की जुताई करने के बाद कुछ दिन के लिए खेत को खुला छोड़ दें. ताकि मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट तेज़ धूप की वजह से नष्ट हो जाएँ.

खेत की जुताई के बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की दो से तीन बार तिरछी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. पलेव करने के बाद जब मिट्टी की ऊपरी सतह हल्की सूखी हुई दिखाई देने लगे तब खेत की फिर से जुताई कर खेत में रोटावेटर चला दें. इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी दिखाई देने लगती हैं. उसके बाद खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल बना दें. ताकि बारिश के वक्त खेत में जलभराव जैसी समस्याओं का सामना ना करना पड़ें.

पौध तैयार करना

शंखपुष्पी की खेती बीज और पौध दोनों तरीके से की जाती हैं. लेकिन पौध के रूप में इसकी खेती करना ज्यादा लाभकारी और अच्छा होता है. क्योंकि बीज के माध्यम से खेती करने पर इसके पौधे लगभग 50 दिन की देरी से पककर तैयार होते हैं और इनका उत्पादन भी कम मिलता हैं.

इसकी पौध किसान भाई नर्सरी में तैयार कर सकते हैं. इसकी पौध रोपाई के लगभग 20 दिन पहले प्रो-ट्रे में तैयारी की जाती हैं. इसके अलावा कई ऐसी नर्सरियां हैं जो इसकी पौध सस्ते दामों पर किसान भाइयों को देती हैं. जिनसे किसान भाई अपने लिए पौध खरीद सकता हैं. लेकिन पौध खरीदते वक्त ध्यान रखे कि पौध रोग रहित और अच्छे से विकास करने वाली होनी चाहिए.

पौधा रोपाई का तरीका और टाइम

शंखपुष्पी की खेती बीज और पौध दोनों तरीकों से की जाती हैं. जिसमें इसके पौधों की रोपाई समतल और मेड़ों दोनों तरीकों से की जाती हैं. साधारण रूप से समतल भूमि में इसकी पौधों की रोपाई क्यारियाँ बनाकर पंक्तियों में की जाती हैं. इसके लिए प्रत्येक पौधों के बीच एक फिट की दूरी होनी चाहिए.

लेकिन इसकी खेती से उत्तम पैदावार लेने के लिए इसे मेड़ों पर उगाना चाहिए. मेड़ों पर उगाने के दौरान इसके पौधों को आपस में 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी पर उगाना चाहिए. इस दौरान मेड़ों के बीच की दूरी एक फिट के आसपास होनी चाहिए. दोनों तरीके से पौध रोपाई के दौरान इसके पौधों की जड़ों को बाविस्टीन से उपचारित कर जमीन में तीन सेंटीमीटर की गहराई में लगाना चाहिए. इसकी पौध रोपाई शाम के वक्त करनी चाहिए. इससे पौधों का अंकुरण अच्छे से होता हैं.शंखपुष्पी के बीज और पौध दोनों की रोपाई बारिश के मौसम में की जाती है. इस दौरान इन्हें जून या जुलाई माह में मौसम की पहली बारिश के बाद ही उगा देना चाहिए. और जिन किसान भाइयों के पास सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वो इसके बीजों को बारिश से पहले भी उगा सकता हैं.

उर्वरक की मात्रा

शंखपुष्पी की खेती औषधीय फसल के रूप में की जाती हैं. इसलिए इसकी खेती में रासायनिक खाद की जगह सिर्फ जैविक खाद का ही इस्तेमाल करना चाहिए. जैविक खाद के रूप में शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त लगभग 15 से 17 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा  बुबाई के समय 35 किलो फॉस्फोरस, 25 किलो नाइट्रोजन ,15 किलो पोटाश के साथ 2 किलो एकड़ का साडावीर का प्रयोग करें। फ़सल के उगने पर या बुबाई के 25 दिन बाद साडावीर फंगस फ़ाइटर और 1 किलो इफको18:18:18 का स्प्रे करें।बुबाई के 40 से 45 दिन में साडावीर 4G और इफ्को 0 :52: 34 का स्प्रे करेँ। बुबाई के 60 दिन में साडा वीर फंगस फ़ाइटर और 0: 0: 50 का स्प्रे श्रेष्ठ उपज देता है।

खरपतवार नियंत्रण

शंखपुष्पी की खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक तरीके से किया जाता हैं. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के दौरान इसके पौधों की दो से तीन गुड़ाई काफी होती हैं. इसके पौधों की पहली गुड़ाई पौध या बीज रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद बाकी की दोनों गुड़ाई एक एक महीने के अंतराल में करनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

शंखपुष्पी के पौधों में सामान्य तौर पर काफी कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन फिर भी पौधों में कोई कीट रोग दिखाई दे तो उनका जैविक तरीके से नियंत्रण करना चाहिए. जैविक तरीके से नियंत्रण के लिए जैविक तरल कीटनाशकों का छिडकाव करना चाहिए. इसके लिए नीम का काढा, नीम के तेल या अन्य जैविक कीटनाशक का इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल की कटाई

शंखपुष्पी के पौधों में रोपाई के लगभग चार से पांच महीने बाद फूल खिलने लग जाते हैं. और उसके एक महीने बाद यानी दिसम्बर माह में इसके पौधों की फलियों में दाने बन जाते हैं. पौधे के विकसित होने के बाद इसकी कटाई जनवरी से मई माह तक चलती हैं. इसके पौधों की कटाई के दौरान इन्हें जड़ सहित उखाड़ा जाता हैं.

इसके पौधों को उखाड़ने से पहले खेत में पानी चला दें. ताकि पौधों को उखाड़ते वक्त किसी भी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े. पौधों को उखाड़ने के बाद उन्हें छायादार जगह में सुखाया जाता हैं. जब पौधे अच्छे से सुख जाते हैं तब उन्हें नमी से बचाने के लिए वायुरोधी थैले में डालकर पैक कर दिया जाता हैं. पेकिंग करने के बाद उन्हें बाज़ार में बेचने के लिए भेज दिया जाता हैं.

 

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