Error message

  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).

व्यावसायिक केला उत्पादन से छोटे और सीमांत किसानों को मिली स्थायी आजीविका

उत्तर प्रदेश के रायबरेली और बाराबंकी जिलों में लगभग 60 प्रतिशत आबादी छोटे भूमि धारकों की है। यहां की मुख्य फसल गेहूं और धान की उत्पादकता और लाभप्रदता निम्न है। इसके अलावा आजीविका के अन्य अवसर भी उपलब्ध नहीं है। कई किसान प्रगति और अपनी आजीविका में विविधता चाहते थे, लेकिन आर्थिक संसाधनों के अभाव के कारण वे ऐसा करने में असमर्थ थे। आर्थिक सशक्तिकरण और आजीविका के विविधीकरण के लिए उन्होंने नकदी फसल के रूप में केले का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। इसके प्रारंभिक दौर में अधिकांश किसानों का यह मानना था कि केला उनके जैसे छोटे भूमि धारकों के लिए एक उच्च जोखिम भरा फसल है, जबकि इसके लिए उनके पास अच्छी भूमि और सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध हैं।

बाराबंकी जिले के त्रिवेदीगंज ब्लाक के राउनीपुर गांव के श्री शिव कुमार त्रिवेदी भारतीय कृषि अुनसंधान परिषद के एनएआईपी-3 परियोजना के तहत लाभ प्राप्त करने वाले 60 किसानों में से एक हैं। इनके पास 0.75 हैक्टर जमीन है जिसपर वे पिछले 20 वर्षों से चावल-गेहूं या चावल-सरसों की पैदावार करते आ रहे थे, जिससे उन्हें प्रतिवर्ष 45 हजार रुपए की आय प्राप्त होती थी। इस आय के जरिए वह तीन महिलाओं और तीन पुरुषों के परिवार का भरण-पोषण करते थे।

एनएआईपी के हस्तक्षेप के बाद इन्होंने वर्ष 2009 में एसआरआई पद्वति द्वारा अपने 0.60 हैक्टर भूमि पर धान-गेहूं की बुआई की जबकि 0.15 हैक्टर भूमि पर केले की जी-9 किस्म लगायी। मानसून के देर से आने के बावजूद भी धान और केले की भरपूर पैदावार हुई। धान के बाद उसने रबी मौसम में जीरो टिल पद्वति से गेहूं की बुआई की जिससे उसे लागत की बचत हुई। उसे दोबारा जुताई करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इससे लगभग 15 दिनों बाद उसे धान और केले की तरह ही गेहूं की भरपूर 30 क्विंटल पैदावार मिली। इस प्रकार एसआरआई पद्वति और जीरो टिल पद्वति से उसे 47000 रुपए की आय मिली।

नीलगाय और बंदरों के आतंक के बावजूद किसान धान और गेहूं के साथ केले की खेती की ओर आकर्षित हुए और इसका उन्हें भरपूर लाभ भी मिला। केले के एक पेड़ से औसतन 30 कि.ग्रा. की पैदावार हुई। इस प्रकार 0.15 हैक्टर भूमि की कुल पैदावार से 1,63,500 रुपए की आय हुई। इस लाभ के लिए शिव कुमार को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी तथा लागत भी कम लगी। उसके परिवार के सदस्यों ने ही मिलकर सारा कार्य किया। अपनी इस पैदावार से शिव कुमार अत्यंत प्रसन्न है। वह खुश है कि वह एक ट्रैक्टर खरीदकर लम्बी अवधि से देखे गए अपने सपने को पूर करने में सक्षम हो जाएगा। उसने अपने एक वर्ष के इस आय से एक आटा चक्की, तेल चक्की और धान मिल स्थापित कर दिया है , जिससे उसकी आय में और भी अधिक वृद्धि हो रही है।

शिव कुमार की सफलता से प्रभावित होकर 70 प्रतिशत किसानों ने इस ओर अपना कदम बढ़ाया। इसके अलावा आसपास के गांव के किसान भी इससे काफी प्रभावित होकर इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। शिव कुमार इसके लिए आईसीएआर का शुक्रिया अदा करता है।

Source :R.B.Rai