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हम खेती को नौकरियों से अव्वल कब मानेंगे

हम खेती को नौकरियों से अव्वल कब मानेंगे

रूस में अरबपति कारोबारी और नौकरी पेशा भी कर रहे खेती की ओर रुख

यूरोपीय देश ग्रीस के वर्तमान आर्थिक संकट पर पूरी दुनिया में बवाल मचा हुआ है। आखिर क्या वजहें हो सकती हैं, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था चकनाचूर हो गई? मैं कोई पेशेवर अर्थशास्त्री नहीं, ना ही कोई विद्वान, लेकिन आपसी चर्चाओं पर गौर करूं तो कहीं ना कहीं युवाओं में स्वावलंबी होने के लिए नकारापन होना एक बड़ी समस्या के तौर पर देखा जा सकता है। ग्रीस की समस्या एक सांकेतिक इशारा है, दुनिया के अन्य देशों के लिए।

 

हमारी हालिया रूस की यात्रा का उद्देश्य वहां के किसानों को भारतीय उत्पादों और कृषि तकनीक से रू-ब-रू करवाना था। हिन्दुस्तान के गाँवों और जमीनी दूरस्थ इलाकों से जुड़े होने का अनुभव और जुगाड़ तथा टिकाऊ पद्धतियों की खेती की थोड़ी बहुत मेरी समझ को रूस के युवा किसान समझना चाहते थे।

 

रूस में मेरी मुलाकात पेशेवर व्यवसायी और उद्योगपति दिमित्री से हुई। एल्युमिनियम विन्डो प्लेट्स और थर्मल रेसिस्टेंट शीट्स (ताप प्रतिरोधी चादरें) बनाने वाली रूस की सबसे बड़ी कंपनी के मालिक ने पिछले चार वर्षों से अपना रुझान गाँवों की तरफ किया। कुल 120 हेक्टेयर में खेती करने वाले दिमित्री जल्द ही एक बड़ी डेयरी खोलने जा रहे हैं। बिलियन डॉलर कंपनी के मालिक को ट्रैक्टर से जुताई करते देखना और रोज शाम ग्रामीण युवाओं से बातचीत करना, तथा बुजुर्गों से सीख लेते देखना मेरे लिया नया और प्रेरणादायक था।

एयरपोर्ट पर मुझे विदा करने आए दिमित्री से मैंने बड़ी सहजता से पूछ लिया, ”आप, पिछले 20 वर्षों से इतने बड़े अरबपति व्यवसायी हैं और फि र अब अचानक चार वर्षों से खेती के तरफ रूझान क्यों? ये शौकिया या कुछ और? उनका जवाब था, ”अमेरिका टूट जाएगा, अर्थव्यवस्था चूर-चूर हो जाएगी। 1990 के अंतिम दशक में जो दौर रूस ने देखा, अब अमेरिका देखेगा। जब अमेरिका डूबेगा, तो यूरोप और तमाम ऐसे देशों को ले डूबेगा जो डॉलर से मोह बनाए हुए हैं। जो लोग डॉलर के ख्वाब देख रहे हैं, वो एक दिन सुबह सोकर उठेंगे तो पाएंगे कि डॉलर सिवा, कागज़ के कुछ नहीं। डॉलर बुरी तरह से लंगड़ा हो चुका होगा। अमेरिका भारी कर्जे में डूबा हुआ देश है, और दिन-ब-दिन इसकी हालत ज़र्जर हो रही है, इसके परिणाम के लिए बहुत लंबे समय तक इंतजार करने की भी जरूरत नहीं, सिर्फ पांच वर्ष।

 

दिमित्री ने आगे कहा, ”खेती के तरफ रुझान की मेरी सबसे बड़ी यही वजह है। मेरा व्यवसायिक अनुभव कहता है कि जिस देश में खेती प्राथमिकता के तौर पर देखी जाएगी, वो आर्थिक संकट के दौर में भी संभला रहेगा। मैं अपने देश से प्यार करता हूं और खेती करके अपनी भूमि और देश का अहसान ही चुका रहा हूं। मुझे देर से यह बात समझ आई। अपनी समझ अब युवाओं से भी साझा कर रहा हूं। बुजुर्गों के अनुभव का फ़ायेदा ले रहा हूं। शायद हम भविष्य में खुद को संभाल पाएं, मेरे कुछ देशवासियों के लिए अन्न और सब्जियों की व्यवस्था कर पाऊं। युवाओं को इस दिशा में लाने के लिए प्रेरणा बन पाऊं, मैं धन्य हो जाऊंगा। यह मेरा छोटा सा प्रयास है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के क्रास रोड पर ग्रीस बसा हुआ है। ग्रीस के वर्तमान हालात, कहीं कोई डॉलर मोह और फि र उसके परिणाम का संकेत तो नहीं? हालिया घटनाक्रम क्या हमें सचेत होने को नहीं कह रहा? क्या हम खेती को कार्पोरेट की नौकरियों से अव्वल मान सकेंगे या अपनाने की जद्दोजहद करेंगे? आखिर ऐसा क्या है जो हमारे देश का युवा भी पश्चिम की तरफ भाग रहा?दिमित्री जैसे रूस के किसानों से क्या कुछ प्रेरणा ली जा सकती है?

दीपक आचार्य